विश्व धर्म संसद 2022

ललित शास्त्री

सनातन मिशन द्वारा वर्ष 2022 में विश्व धर्म संसद का आयोजन किया जा रहा है। सनातन धर्म तथा विभिन्न विषयों तथा क्षेत्रों से जुड़ी विभूतियों को इस महासभा में भाग लेने की लिए आमंत्रित किया जाएगा। यह महासभा पूर्णतः सनातन धर्म, १०० करोड़ से भी अधिक नागरिकों की आस्था और विश्व शांति के लिए समर्पित होगी।

सनातन धर्म के अनुसार “सत्य एक है”। सनातन धर्म का अकाट्य नियम है – “एकं सत विप्र बहुधा वदंती” – अर्थात  सत्य एक है, परन्तु बुद्धिमान इसे अलग-अलग दृष्टि से देखते व समझते हैं, ऋग्वेद 1:164:46।

सनातन धर्म में कोई हठधर्मिता नहीं है।  सनातन धर्म – वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण, महाभारत और भगवद गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से जीवन को उचित एवं सही तरीके से जीने का मार्ग प्रशस्त करता है।

सनातन धर्म व्यक्तियों एवं समाज को उनकी आस्था के आधार पर विभाजित नहीं करता। सनातन धर्म को मानने वाले “हम और  वे” जैसी भावना नहीं रखते और किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते। सनातन धर्म जीवन शैली है या दूसरे शब्दों में कहें तो सनातन धर्म हमें जीने  का  सही मार्ग दिखाता है – वह मार्ग जो कि सनातन या हिन्दू दर्शन तथा ज्ञान, जो कि हजारों वर्षों में  विकसित हुआ है, उस पर केंद्रित है।

सनातन धर्म तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भिन्न-भिन्न विचारों की स्वीकृति का प्रतीक है। जो भी सनातन धर्म में विश्वास रखते हैं वे सभी पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखते हैं। इस प्रकृति के मूल को परिलक्षित करता है संस्कृत में परिभाषित यह  सिद्धांत – ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ ।

जब हम सनातन ज्ञान मार्ग पर चलते हैं तो प्रश्न उठते हैं – मैं कौन हूं और क्यों हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है – जीवित और निर्जीव  – सभी के – प्राणियों के, वस्तुओं के – परिप्रेक्ष में , जो पहले था, जो अभी है और भविष्य में रहेगा; सनातन धर्म का जो अथाह ज्ञानसागर है, वह इन प्रश्नों के उत्तर तो देता ही है साथ ही साथ हम मे चेतना भी जगाता है – वह चेतना जो पहले इंद्रियों तक ही सीमित रहती है परन्तु आगे चल कर यदि हम धर्म मार्ग पर चलने में सफल होते हैं तो अनंत चेतना जागृत होती है तथा ज्ञान की प्राप्ति  होती है और यही सर्वोच्च सत्य है। संक्षेप में, सनातन धर्म मानव मात्र में परस्पर सम्बन्ध तो स्थापित करने में मदद करता ही है, वह अनंत चेतना और आदर्श जीवन तथा लक्ष्य प्राप्ति में भी मदद करता है।

ऋग्वेद में पुरुष सूक्त के इस मंत्र के माध्यम से यह बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है, – मन्त्र है –

वेदाहं एतं पुरुष: महंतम आदित्यवर्ष: तमस: परस्तत /

तम एव विदित्वाति मृत्युं एति नन्यां पंथा विद्याते ‘यानय // 3.8 //

मैं उस महान पुरुष को जानता हूं, जो सूर्य की तरह और अंधकार से परे चमकता है। केवल उसे जानने से ही कोई मृत्यु के उस पार जाता है; वहाँ जाने का कोई और मार्ग नहीं है ।

भारत में  एक अरब से अधिक नागरिक सनातन धर्म में आस्था रखते हैं।  सनातन धर्मावलम्बी विश्व की जनसंख्या का लगभग 17 प्रतिशत हैं। सनातन धर्म, अर्थात हिंदू धर्म, का पालन करने वाले, यदि पूरी समग्रता से देखा जाये, हिंदू संस्कृति और सभ्यता का प्रतिनिधित्व करते हैं. यदि एक शब्द में इसकी व्याख्या करनी हो तो यही हिंदुत्व है।­

कई सदियों से, भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदुओं की अनेक पीढ़ियां लगातार बर्बर आक्रमणों, लूट और विनाश के दौर से गुज़री हैं। उन्होंने अपने मंदिरों और शिक्षा के केंद्रों का विदेशी आक्रमण कारियों द्वारा विनाश, नागरिकों का वध तथा तलवार की नोक पर धर्मांतरण होते देखा है। लगभग 1000 साल पहले जो शुरू हुआ उसकी परिणति हुई 1947 में जब भारत के  विभाजन के साथ धर्म के आधार पर  पाकिस्तान बना  … यह सब रातोंरात नहीं हुआ।  हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान बना सैकड़ों हजारों व्यक्तियों के नरसंहार और असंख्य लोगों के विस्थापन के साथ।

22 मार्च, 1940 को लाहौर में दिए गए मुहम्मद अली जिन्ना के अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण पर सभी को ध्यान देना चाहिए। जिन्ना ने कहा था:

“हिंदू मित्र इस्लाम और हिंदू धर्म की वास्तविक प्रकृति को समझने में विफल हैं। वास्तव में, दोनों ही अलग-अलग सामाजिक व्यवस्था हैं, और यह एक सपना देखने जैसा है कि हिंदू और मुसलमान कभी भी एक समान राष्ट्रीयता विकसित कर सकते हैं, और भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखना परेशानी उत्पन्न करेगा और यदि समय रहते हमने अपनी धारणाओं को नहीं बदला तो भारत विनाश की और बढ़ेगा । हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाजों से जुड़े हैं ……”

यदि जिन्ना के इस कथन को ध्यान में रखें तो कोई आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान और उसके नेता पाकिस्तान के निर्माण से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए सब कुछ किया है लेकिन इस मकसद में वे असफल रहे हैं क्योंकि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

अपने नापाक मंसूबों में कामयाब नहीं होने और कई युद्ध हारने के बाद, पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ आतंकी हमले शुरू किये।  इस कड़ी में उन्होंने आतंकियों को अपने क्षेत्र में तैयार और प्रशिक्षित कर भारत में लगातार आतंकी हमले जारी रखे।  1990 में जेहादी आतंकवादियों ने कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों से खदेड़ने के लिए आतंक और तबाही मचाई। अंततः नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को समाप्त  किया गया और इस प्रकार अब वहां स्थिति नियंत्रण में हैं।

जहाँ तक व्यापक परिदृश्य का प्रश्न है, भारत में अस्थिरता पैदा करने वाली शक्तियां सर उठा रही हैं।  वे न केवल धार्मिक आधार पर देश को एक बार फिर विभाजित करना चाहती हैं, बल्कि मार्क्सवादियों, शहरी नक्सलियों और पश्चिम में जो उनके अनेक विकृत तथाकथित विद्वान-समर्थक हैं,  उनकी मदद से भारत पर लगातार हमला किया जा रहा है।

ऐसे तत्वों को नहीं दिख रहा है 1992 में गोधरा, गुजरात में जो हुआ, 1992 में  मुंबई में हुए  बम विस्फोट, 2001 में नई दिल्ली में संसद पर हमला, 26/11 का मुंबई हमला और ऐसे अनेक हमले। आज जब हम  इतिहास के ऐसे मोड़ पर हैं , जब तालिबान अत्याचार कर रहा है और अफगानिस्तान के लोगों के मानवाधिकारों को कुचल रहा है, जब आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है,  एक मुट्ठी भर लोगों का समूह, जिसमे अनेक भारतीय मूल के भी हैं, जो स्वयं को विद्वान घोषित करते हैं, उन्होंने मिलकर हिंदू धर्म के प्रति घृणा फैलाने के उद्देश्य से एक कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसे डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व (डीजीएच) सम्मेलन कहा गया। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालय हैं। सोचने की बात है, यदि हिन्दू धर्म को मानने वाले इन विश्वविद्यालयों का बहिष्कार कर दें तो उनकी साख का क्या होगा।


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