सनातन धर्म

गुरु ललितेंद्र

सनातन धर्म आरम्भ से ही निहित सभी ज्ञान, परंपराओं और मान्यताओं का योग है। यह किसी भी विषय से प्राप्त कोई वाद (ism) नहीं है, लेकिन ज्ञान का सागर है जिसे समग्रता में नहीं समझा जा सकता है या इसके बारे में एक जीवनकाल में महारत हासिल नहीं की जा सकती है।

चाहे हम मौखिक परंपरा के माध्यम से हजारों वर्षों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चली आ रही वेदों, श्रुति और स्मृतियों की बात करें या वाल्मीक रामायण और श्रीमद्भगवद् गीता जैसे पवित्र ग्रंथों की – यह सब विरासत है, ज्ञान का विषय नहीं है, अपितु ज्ञान के पूरे उद्देश्य का हिस्सा है। यह ज्ञान भारतीय जीवन पद्धति की पहचान है जिसमे समय और स्थान की सीमाओं से परे कई सभ्यताओं और संस्कृतियों का समावेश है।

अपनी समग्रता में सनातन धर्म में निहित है ज्ञान का विशाल खजाना, सर्वशक्तिमान देवताओं और बहुदेवों के प्रति असीम आस्था और विश्वास। साथ ही साथ हजारों वर्षों से सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए यह ज्ञान रुपी सागर जीवन पथ का प्रतीक भी है।

सनातन का अर्थ है जिसका न आदि है न अंत और धर्म का अर्थ है वह सिद्धांत या नियम जो जीवन के क्रमबद्ध तरीके को परिभाषित करता है। सनातन की न ही कोई शुरुआत है और न ही कोई अंत। इसलिए सनातन धर्म अनम्य (INFLEXIBLE) नहीं हो सकता, कर्म की प्रक्रिया का मार्गदर्शन करने के लिए ज्ञान की श्रेष्ठता और समग्रता को छोड़कर यह पूर्णतः समावेशी है।