मनुस्मृति की असहज विरासत और सनातन चिंतन का विराट विस्तार

गुरु ललितेंद्र

मनुस्मृति पर बहस ने एक नया राजनीतिक रूप ले लिया है। 22 अगस्त, 2026 को पुणे में छात्राओं के साथ ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने फिर से मनुस्मृति का ज़िक्र किया। उन्होंने “मनुस्मृति वाली सोच” को ऐसी सोच बताया जो महिलाओं को पुरुषों के अधीन रखती है और छात्राओं से “पितृसत्ता को खत्म करने” का आह्वान किया। उन्होंने पिता, पति और बेटों के साथ महिला के रिश्ते से जुड़ी जानी-पहचानी बातों का हवाला दिया और उन शब्दों को शर्मनाक बताया। मनुस्मृति की ऐतिहासिक बातों पर बहस करने या महिलाओं की गरिमा, समानता या आज़ादी को नकारने वाली किसी भी सामाजिक प्रथा को चुनौती देने में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन राहुल की बात उस बड़ी समस्या को भी दिखाती है जिस पर यह लेख ध्यान आकर्षित करता है: क्या ऐसी सभ्यता को – जिसकी बौद्धिक विरासत में वेद, श्रुति और स्मृति, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद गीता, और हज़ारों सालों की दार्शनिक खोज शामिल है – सिर्फ़ एक स्मृति से कुछ बातें चुनकर और उन्हें सनातन धर्म की “सोच” बताकर सही ढंग से पेश किया जा सकता है? यह सभ्यता की परंपरा के साथ गंभीरता से जुड़ना नहीं है; यह ज्ञान के सागर को सिर्फ़ एक किताब तक सीमित कर देना है।

सनातन धर्म को समझने, परखने अथवा उसकी आलोचना करने के लिए बार-बार मनुस्मृति को कसौटी बनाना अपने आप में एक विचारणीय विडंबना है। मनुस्मृति में ऐसे प्रसंग और विधान निश्चय ही हैं, जिनका ऐतिहासिक संदर्भ में अध्ययन और आलोचनात्मक विवेचन होना चाहिए। लेकिन एक स्मृति को ही आधार बनाकर एक सम्पूर्ण सभ्यता, उसकी दर्शन-परंपरा और उसकी ज्ञान-दृष्टि को परिभाषित अथवा कठघरे में खड़ा करना, अंश को सम्पूर्ण मान लेने जैसा है।

समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब ऐसा करते हुए उस विराट बौद्धिक परंपरा को ही अनदेखा कर दिया जाता है, जिसके भीतर सनातन धर्म का विकास हुआ और जो सहस्राब्दियों तक निरंतर विकसित होती रही।

सनातन धर्म किसी एक विषय या किसी एक ग्रंथ से निकला हुआ कोई “वाद” नहीं है। वह ज्ञान के किसी एक विषय तक सीमित नहीं, बल्कि स्वयं समग्र ज्ञान-वस्तु के साथ मनुष्य की सतत् यात्रा का हिस्सा है। भारतीय सभ्यता को समझने के लिए शायद इससे अधिक महत्वपूर्ण कोई और अंतर नहीं हो सकता।

वेद, श्रुति और स्मृतियां हजारों वर्षों तक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक एक अद्भुत मौखिक परंपरा के माध्यम से संप्रेषित होती रहीं। इसके साथ आरण्यक, ब्राह्मण और उपनिषदों ने इस ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाया और वाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा श्रीमद्भगवद्गीता ने उसे जीवन, नैतिकता और धर्म के विराट आख्यानों में अभिव्यक्त किया। पुराणों और उसके बाद विकसित हुई असंख्य दार्शनिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक परंपराओं ने इस विरासत को और समृद्ध किया।

इस समूचे विराट ज्ञान-संसार को एक स्मृति की संकीर्ण सीमा में समेट देना इसलिए केवल सनातन धर्म की अधूरी व्याख्या नहीं है; यह उसकी मूल प्रकृति को ही न समझ पाने का प्रमाण है।

सनातन धर्म इस आग्रह पर आधारित नहीं है कि किसी एक ग्रंथ में सभी प्रश्नों के उत्तर मिल चुके हैं और उसके बाद प्रश्न करना बंद कर देना चाहिए। इसके विपरीत, इसकी पूरी बौद्धिक यात्रा ही प्रश्नों की यात्रा है – सत्य क्या है? ज्ञान क्या है? मैं कौन हूं? मेरे अस्तित्व का प्रयोजन क्या है? चेतना क्या है? व्यक्ति, प्रकृति, ब्रह्मांड और परम सत्य के बीच क्या संबंध है?

इसीलिए श्रुति और स्मृति का अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रुति उस ज्ञान-परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जिसे ऋषियों ने “सुना” अथवा अनुभूत किया, जबकि स्मृति मनुष्य द्वारा स्मरण, व्याख्या और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अभिव्यक्त ज्ञान-परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। दोनों को एक ही स्तर पर रखकर किसी एक स्मृति को सनातन धर्म का अंतिम और अपरिवर्तनीय विधान मान लेना भारतीय ज्ञान-परंपरा की प्रकृति के विपरीत है।

वास्तव में स्मृति-परंपरा का अस्तित्व ही इस बात का प्रमाण है कि सनातन चिंतन ने धर्म को बदलती हुई सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने और व्याख्यायित करने की आवश्यकता को स्वीकार किया।

इसलिए जब आज मनुस्मृति के कुछ अंशों को सामने रखकर यह दावा किया जाता है कि मानो यही सम्पूर्ण हिंदू सभ्यता का अंतिम सामाजिक अथवा नैतिक संविधान हो, तो यह इतिहास और दर्शन – दोनों के साथ न्याय नहीं करता।

सनातन चिंतन का बौद्धिक आकाश इससे कहीं अधिक विराट है।

उसके केंद्र में ऋग्वेद का एक अद्भुत वाक्य है –

“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।”

सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक प्रकार से कहते हैं।

यह केवल सहिष्णुता का उद्घोष नहीं है। यह ज्ञान के स्वरूप के बारे में एक गहरी दार्शनिक स्थापना है। मनुष्य सत्य को अलग-अलग दृष्टियों से देख सकता है, उसकी अलग-अलग व्याख्या कर सकता है और फिर भी उस सत्य की अंतिम एकता से विमुख हुए बिना विचार कर सकता है।

अर्थात सत्य की खोज के अनेक मार्ग हो सकते हैं।

यही कारण है कि सनातन धर्म मनुष्य को केवल “आस्तिक” और “नास्तिक”, “हम” और “वे” जैसी कठोर श्रेणियों में बांटकर देखने वाली दृष्टि तक सीमित नहीं रहता। यहां प्रश्न करने की गुंजाइश है, तर्क की जगह है, असहमति की जगह है, अनेक दार्शनिक मतों के सह-अस्तित्व की जगह है और सत्य की खोज के भिन्न-भिन्न मार्गों के लिए भी स्थान है।

सनातन का मार्ग बौद्धिक एकरूपता का मार्ग नहीं है।

यह मंथन का मार्ग है।

और शायद भारतीय दर्शन की सबसे विशिष्ट पहचान भी यही है।

प्रश्न क्रमशः गहरे होते जाते हैं। मैं कौन हूं? मेरे अस्तित्व का उद्देश्य क्या है? चेतना क्या है? क्या वास्तविकता वही है जिसे इंद्रियां अनुभव करती हैं? व्यक्ति और विराट के बीच क्या संबंध है? क्या आत्मा और परम सत्य दो अलग-अलग अस्तित्व हैं या उनके बीच कोई ऐसी एकता है जो हमारी सामान्य चेतना से परे है?

सीमित से असीम की ओर, इंद्रिय-बोध से चेतना की ओर और चेतना से परम सत्य की खोज की ओर बढ़ना भारतीय ज्ञान-परंपरा की मूल यात्रा है।

पुरुषसूक्त का यह मंत्र इस आकांक्षा को अत्यंत गहन शब्दों में व्यक्त करता है –

“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥”

मैं उस महान पुरुष को जानता हूं, जो सूर्य के समान प्रकाशमान है और अंधकार से परे है। उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु से परे जाता है; उस परम लक्ष्य तक पहुंचने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।

इन शब्दों को कोई अध्यात्म के रूप में देखे, दर्शन के रूप में या अस्तित्व के अंतिम सत्य की खोज के रूप में – मूल प्रेरणा स्पष्ट है। ज्ञान केवल सूचनाओं का संचय नहीं है। ज्ञान मनुष्य को अपनी सीमित चेतना से उठाकर परम वास्तविकता की अनुभूति की ओर ले जाने वाली यात्रा है।

यहीं से सनातन चिंतन का महान दार्शनिक मंथन अपना वास्तविक अर्थ ग्रहण करता है।

उपनिषदों ने प्रश्नों के द्वार बंद नहीं किए – उन्होंने उन्हें और व्यापक खोल दिया।

भगवद्गीता ने केवल किसी आस्था को स्वीकार करने का आग्रह नहीं किया। उसने मनुष्य को उसके सबसे गहरे नैतिक और अस्तित्वगत संकट के बीच खड़ा किया और कर्म, ज्ञान, भक्ति, कर्तव्य और आत्मा के स्वरूप पर गंभीर दार्शनिक विमर्श किया।

रामायण और महाभारत ने मनुष्य के जीवन को केवल सरल नैतिक सूत्रों में नहीं बांधा। उन्होंने ऐसे प्रसंगों के माध्यम से धर्म की जटिलता को सामने रखा, जहां मनुष्य को परस्पर टकराते कर्तव्यों, इच्छाओं, संबंधों, निष्ठाओं और परिणामों के बीच निर्णय लेना पड़ता है।

इस मंथन का परिणाम कोई एक संकीर्ण सिद्धांत नहीं था। इसके परिणामस्वरूप दर्शन की अनेक धाराएं विकसित हुईं, जिनके बीच सहमति भी थी और गहरा मतभेद भी।

इसी विराट बौद्धिक परिदृश्य में आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के माध्यम से सनातन चिंतन की एक अत्यंत गहन दार्शनिक परिणति को स्वर दिया।

अद्वैत – अर्थात द्वैत का निषेध, अथवा अंतिम सत्य में अद्वितीय एकत्व – यह प्रतिपादित करता है कि व्यक्ति और परम सत्य के बीच जो अलगाव हमें दिखाई देता है, वह अंतिम वास्तविकता नहीं है। परम सत्य ब्रह्म है और आत्मा अपने अंतिम स्वरूप में उससे पृथक नहीं है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सनातन धर्म की प्रत्येक दार्शनिक परंपरा अद्वैत को ही अंतिम मत मानती है। द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अन्य अनेक दार्शनिक परंपराएं भी इसी विराट चिंतन-परंपरा में विकसित हुईं। बल्कि अद्वैत का महत्व इस बात में है कि वह हमें दिखाता है कि इस सभ्यता का बौद्धिक मंथन किसी संकीर्ण सामाजिक संहिता पर समाप्त नहीं हुआ। वह चेतना, अस्तित्व और परम वास्तविकता जैसे प्रश्नों तक पहुंचा।

जिस सभ्यता ने ऐसे दार्शनिक प्रश्नों को जन्म दिया और उन पर सहस्राब्दियों तक विचार किया, उसे एक स्मृति में दर्ज सामाजिक व्यवस्थाओं तक सीमित करके देखना बौद्धिक रूप से संभव ही नहीं है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मनुस्मृति का अध्ययन न किया जाए। ऐतिहासिक ग्रंथों का ईमानदारी से अध्ययन होना चाहिए। उनके समय, संदर्भ और सामाजिक परिस्थितियों को समझना चाहिए। उनके विधान की आलोचनात्मक समीक्षा भी होनी चाहिए।

लेकिन आलोचना तब बौद्धिक रूप से कमजोर हो जाती है, जब किसी एक ऐतिहासिक ग्रंथ के विवादास्पद अंशों को सम्पूर्ण सभ्यता का सार घोषित कर दिया जाता है।

भारत को समझने के लिए भी वही बौद्धिक कसौटी अपनानी होगी जो हम अन्य सभ्यताओं के लिए अपनाते हैं।

कल्पना कीजिए कि आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को उसकी किसी एक ऐतिहासिक व्यवस्था या उसके सबसे आपत्तिजनक कानूनों के आधार पर ही परिभाषित कर दिया जाए और उसके दर्शन, साहित्य, विज्ञान, लोकतांत्रिक विकास, संवैधानिक विमर्श और सदियों की बौद्धिक बहस को पूरी तरह भुला दिया जाए। उससे जो चित्र बनेगा, वह इतिहास नहीं, इतिहास का एक विकृत अंश होगा।

भारत और सनातन धर्म के साथ भी यही न्याय होना चाहिए।

सनातन धर्म किसी एक ऐतिहासिक काल में स्थिर हो गई सभ्यता नहीं है। उसका स्वरूप समय और स्थान के साथ बदलता रहा है। उसमें असंख्य समुदाय, भाषाएं, परंपराएं, संस्कृतियां, आस्थाएं, अनुष्ठान और दार्शनिक मत समाहित हैं। उसकी निरंतरता कभी भी पूर्ण एकरूपता पर निर्भर नहीं रही।

यही विविधता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” – सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है – इस दृष्टि में इसी व्यापकता का एक और आयाम दिखाई देता है। चिंता का दायरा केवल अपने समुदाय तक सीमित नहीं रहता। भारतीय दार्शनिक कल्पना मनुष्य से आगे बढ़कर समूचे जीवन और अंततः समस्त अस्तित्व की परस्पर संबद्धता तक पहुंचती है।

इसलिए सनातन धर्म को केवल किसी आचार-संहिता का पालन मानना उसके वास्तविक स्वरूप को छोटा कर देना होगा। वह ज्ञान, चेतना, विवेक और सम्यक् आचरण पर आधारित जीवन-दृष्टि है।

उसके मूल प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने हजारों वर्ष पहले थे – सत्य क्या है? मैं कौन हूं? चेतना क्या है? दूसरे मनुष्य के प्रति मेरा दायित्व क्या है? जीवन का प्रयोजन क्या है? इंद्रियों और अहंकार द्वारा निर्धारित सीमाओं से परे क्या कोई ऐसी वास्तविकता है, जिसकी खोज मनुष्य कर सकता है?

इन प्रश्नों के उत्तर पर किसी एक ग्रंथ या किसी एक प्राधिकारी का एकाधिकार नहीं रहा।

सहस्राब्दियों से इन प्रश्नों पर विचार हुआ है, बहस हुई है, मतभेद हुए हैं, व्याख्याएं हुई हैं और नई व्याख्याएं सामने आती रही हैं।

यही सनातन का मंथन है।

और शायद यही वह बिंदु है जिसे मनुस्मृति के इर्द-गिर्द बार-बार होने वाली समकालीन बहसें अक्सर भूल जाती हैं।

सनातन धर्म को समझने के बजाय यदि कोई व्यक्ति उसके एक ऐतिहासिक ग्रंथ से लगातार बहस करता रहे, तो वह एक ग्रंथ के साथ बहस कर रहा है – एक सभ्यता के साथ नहीं।

सनातन धर्म मनुस्मृति नहीं है।

वह वेद और उपनिषद हैं। वह श्रुति और स्मृति हैं। वह आरण्यकों और ब्राह्मण ग्रंथों की जिज्ञासा है। वह रामायण और महाभारत का जीवन-दर्शन है। वह भगवद्गीता का अस्तित्वगत संवाद है। वह उन असंख्य दार्शनिक परंपराओं का मंथन है जिन्होंने सत्य और वास्तविकता की प्रकृति पर प्रश्न उठाए। वह ज्ञान और चेतना की निरंतर खोज है।

और उस दार्शनिक यात्रा के उच्चतम शिखरों में से एक है अद्वैत का वह गहन बोध – कि अस्तित्व की दिखाई देने वाली अनेकता के नीचे एक ऐसी मौलिक एकता विद्यमान है, जिसे जानना ही मनुष्य की सर्वोच्च आध्यात्मिक यात्रा हो सकती है।

इसलिए सनातन धर्म को समझना हो तो एक लहर को पकड़कर समुद्र को समझने का प्रयास नहीं, बल्कि समुद्र में उतरना होगा।

जो लोग सनातन धर्म के साथ गंभीर संवाद करना चाहते हैं, वे प्रश्न करें, आलोचना करें, असहमति व्यक्त करें और बहस करें – उनका स्वागत है। क्योंकि प्रश्न और मंथन स्वयं सनातन परंपरा के अभिन्न अंग हैं।

लेकिन यदि उद्देश्य किसी सभ्यता को समझना है, केवल उसे कठघरे में खड़ा करना नहीं, तो संवाद इतना व्यापक होना चाहिए कि उसमें उसकी सम्पूर्ण ज्ञान-परंपरा समा सके।

अन्यथा मनुस्मृति पर कितनी भी लंबी बहस क्यों न हो, वह अंततः एक स्मृति के साथ बहस ही रहेगी।

और एक स्मृति से बहस करके ज्ञान के एक महासागर को समाप्त नहीं किया जा सकता।